ज़िन्दगी पर जोर कुछ चलता नहीं,
पर समय भी एक सा रहता नहीं।
नफ़रतों के दौर में अफ़सोस है,
आदमी को और कुछ दिखता नहीं।
भूख़ बेची, बेच डाले जिस्म तक,
कौन कहता आदमी बिकता नहीं।
लड़ रहें हैं ये सियासत दान यूँ,
क्यूँ इन्हें कुछ भी कोई कहता नहीं,
हर तरफ़ ही है भयावह युद्ध ये,
शांति का कुछ मार्ग भी दिखता नहीं,
दफ़्न है इंसानियत इस दौर में,
राब्ता इससे कोई रखता नहीं।
हो गई धूमिल धरा की रश्मियाँ,
तीरगी पर जोर कुछ चलता नहीं।
©®रश्मि ममगाईं

