कौन दे दिल को सज़ा ये ज़ुल्म ढाने के लिए
पास उसके कितनी बातें हैं बनाने के लिए
इस तरह ईमान को बाँटे हुए है आदमी
एक है अपने लिए दूजा ज़माने के लिए
ठोकरें कुछ और लगने दो उठा लेंगे क़लम
हैं अभी कितने बहाने चोट खाने के लिए
किस तरह बीती है सारी शब मेरी पूछो न अब
रात भर जलती रही सूरज उगाने के लिए
आँधियों को रोक लें हम आइये मिलकर सभी
ये बड़ी बेताब हैं घर को ढहाने के लिए
मिट चुके जब नक़्श मेरे तेरी गलियों से सभी
क्यों न बदलूँ मैं भी रस्ता आने जाने के लिए
फिर करूँ तुझसे मुहब्बत सोचती हूँ “मेघना”
हैं मचलते ख़्वाब कितने टूट जाने के लिए
©®तनूजा उप्रेती”मेघना”

