कोटद्वार: देवभूमि उत्तराखंड की पावन कण्व नगरी कोटद्वार में जन्मी सुलभा जोशी एक प्रतिष्ठित भारतीय कलाकार, सांस्कृतिक शोधकर्ता, कला शिक्षिका एवं पारंपरिक भारतीय कला की विशेषज्ञ हैं। हिमालय की आध्यात्मिक चेतना, भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत तथा लोक परंपराओं के संस्कारों ने बचपन से ही उनके व्यक्तित्व और कलात्मक दृष्टि को आकार दिया। कला उनके लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सभ्यता को संरक्षित एवं विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करने का एक सशक्त संकल्प है।
वर्तमान में वे Modern Pythian Games में Associated Art Director के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही हैं। पिछले 15 से अधिक वर्षों से वे भारतीय ललित कला, लोक एवं जनजातीय कला, सांस्कृतिक विरासत, दृश्य कला (Visual Arts), पारंपरिक शिल्प, कला शिक्षा एवं रचनात्मक नवाचार के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।
वर्ष 2026 में उन्होंने एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए 1st SCO Nations Youth Delphic Games, Bishkek, Kyrgyzstan में Visual Arts श्रेणी की भारत की प्रथम अंतरराष्ट्रीय ज्यूरी सदस्य (International Jury Member) बनने का गौरव प्राप्त किया। इस उपलब्धि के साथ वे उत्तराखंड से इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वहन करने वाली अग्रणी कलाकारों में सम्मिलित हुईं। यह सम्मान भारतीय कला एवं संस्कृति को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
सुलभा जोशी की कलाकृतियाँ भारत के विभिन्न प्रतिष्ठित कला दीर्घाओं, सांस्कृतिक संस्थानों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। उनके कार्य भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और समकालीन कलात्मक दृष्टि का उत्कृष्ट समन्वय प्रस्तुत करते हैं।
भारतीय कला के प्रति अपने समर्पण के कारण सुलभा जोशी ने भारत के विभिन्न राज्यों की यात्राएँ कीं तथा संबंधित क्षेत्रों में निवास करते हुए वहाँ की पारंपरिक कला शैलियों का अध्ययन एवं अभ्यास किया। उन्होंने प्रत्येक कला को उसकी मूल परंपरा में समझने के लिए उन राज्यों के प्रतिष्ठित गुरुओं, वरिष्ठ लोक कलाकारों एवं पारंपरिक शिल्पाचार्यों से प्रत्यक्ष प्रशिक्षण प्राप्त किया। यही कारण है कि उनके कार्यों में भारतीय लोक एवं पारंपरिक कलाओं की मौलिकता, प्रामाणिकता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

वे भारत की विविध पारंपरिक एवं लोक कला शैलियों—उत्तराखंड ऐपण एवं लोक कला, मधुबनी, वारली, गोंड, पिथौरा, पट्टचित्र, कलमकारी, तंजौर, केरल म्यूरल, फड़ चित्रकला, पिचवाई, मंडना, सोहराई, कोहबर, कांगड़ा, बसोहली, चंबा रूमाल, रोगन कला, ब्लू पॉटरी, कागज़ी पॉटरी, टेराकोटा, डोकरा कला, निर्मल पेंटिंग, चेरियाल स्क्रॉल, मंजूषा कला, सिक्की कला, अल्पना, रंगोली, कोलम, कलमेजुथु, सुलेख (Calligraphy), इलस्ट्रेशन, भित्ति चित्र, जनजातीय कला एवं सामुदायिक कला अभ्यास सहित अनेक भारतीय कला परंपराओं में विशेषज्ञता रखती हैं।
एक कलाकार, शोधकर्ता और सांस्कृतिक दूत के रूप में सुलभा जोशी का उद्देश्य भारत की समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण, संवर्धन एवं वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना है। वे पारंपरिक कला को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करते हुए नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का सतत प्रयास कर रही हैं। उनके लिए कला केवल सृजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिकता और लोकजीवन को विश्व मंच तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है।
आज सुलभा जोशी भारतीय पारंपरिक कला, सांस्कृतिक संरक्षण, कला शिक्षा, शोध एवं अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग के क्षेत्र में एक सम्मानित नाम हैं तथा अपने कार्यों के माध्यम से भारत की समृद्ध कलात्मक विरासत को विश्वभर में नई पहचान दिलाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

