‘ माँ ‘
कंपकपाते डगमगाते, जब भी चलता था तू।
बांहें फैलाये थाम लेती थी मैं।
नींद में जब भी जगता था तू,
डर ना जाये संग संग जग लेती थी मैं।
तेरी भूख का हर दम ख़्याल था मुझको,
तू खुश रहे हर पल जतन किया करती थी मैं।
समय का चक्र चलता है यूँ,
जब भी मैं कंपकंपाऊं, कभी डगमगाऊं,
बढ़ के थाम लेना तू मुझे।
तेरी मज़बूरियों का भान है मुझको,
दूर से ही सही,पर हर रोज़
याद कर लेना तू मुझे,
पुकार लेना तू मुझे।
©® बीना नौडियाल खंडूरी
देहरादून

