हक़ीक़त से आंखें चुराने लगे हैं।
नए रोज़ क़िस्से सुनाने लगे हैं।
अदावत के बीजों को दिल में उगाकर,
मुहब्बत का पौधा सुखाने लगे हैं।
बड़े ख़ूबसूरत हैं नारों के चेहरे,
मगर घर के चूल्हे बुझाने लगे हैं।
अजब दौर है चोर मुनसिफ़ बने हैं,
वही फ़ैसला भी सुनाने लगे हैं।
सभी जानते हैं हक़ीक़त अगरचे,
तमाशे पे ताली बजाने लगे हैं।
हवा अपनी मुट्ठी में करने की ज़िद में,
चराग़ों से रिश्ते निभाने लगे हैं।
क़लम की सियाही से इतना डरे वो,
किताबों पे पहरे बिठाने लगे हैं।
हुनर हार बैठा सिफ़ारिश के आगे,
निकम्मों को रुतबा दिलाने लगे हैं।
बताएं किसे ‘दर्द’ हम उनकी मंशा,
बहाने नए वो बनाने लगे हैं।
©® लक्ष्मी प्रसाद बडोनी
दर्द गढ़वाली, देहरादून

