September 11, 2026

3 thoughts on “दिन भी अब द्वी चार रयां छिन – रश्मि ममगाईं

  1. दिन भी अब द्वी चार रयां छिन
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    गौं खाली ह्वे गीन अबता,
    कूड़ी मकड़ा जाल लग्या छिन
    चार गऊं का ये फाट मा,
    छः मनखी द्वी बाघ रयां छिन।

    सरकारों की माया दयाखा,
    खंदरुयूँ मा भी नलखा लग्या छिन,
    सड़क अयीं च गौं तक अब ता,
    चौरू का भी भाग खुल्या छिन।

    ज्यूँ पुंगड्यू का बाना पुरणा,
    लड़दा छा आपस मा वूमाँ,
    काश कभी वो देखी सकदा,
    कंडरियूँ का अब कांडा उग्या छिन।

    बूढ़ बुढ्या द्वी चार रयां छिन,
    नौना देहरादून बस्या छिन,
    आस लगीं छिन लौटी आला,
    आँखियू माँ अँसुधार अयां छिन,

    देवों की धरती च अपणी,
    कन क्वे छोड़ी जौला इथे,
    ईं धरती माँ ही मिटी जौला,
    दिन भी अब द्वी चार रयां छिन।

    बूंण बनै अब सिमटी गैना,
    एक शग्वाड़ी ही बस रे ग्याई,
    कुछ ह्वे जालु कुछ मांगी ल्योला,
    छुट्टीयूँ माँ नौन्याल अयां छिन!

    ©®#रश्मि_ममगाईं
    ❤️
    उत्तराखंड

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