पिता की भावनाएँ क्यों नहीं खुलकर समझते हो,
यही वह देवता हैं तुम जिन्हें पत्थर समझते हो।
धरा वो हैं, गगन वो हैं, वही हैं छाँव बरगद की,
उन्हीं की गोद है जिसको, सुनो तुम घर समझते हो।
नसीबों से मिला तुमको यहाँ परिवार वाला सुख,
अनाथों की तरह जीना बहुत दुष्कर, समझते हो?
जरा ताकत मिली तुमको, अकड़ते फिर रहे हो तुम,
दबा है पैर के नीचे, किसी का सर समझते हो।
किसी दिन हो न जाए कुछ तमाशा जान लो इतना
किसी के मौन को तुम प्रश्न का उत्तर समझते हो
इसी से तो नहीं कहते कभी हम बोलकर कुछ भी
हमारे हर इशारे को तुम्हीं बेहतर समझते हो।
भटकते हो अँधेरे में नहीं जब रश्मियाँ दिखतीं,
स्वयं को किसलिए तुम फिर, कहो ईश्वर समझते हो।
©®रश्मि ममगाई
उत्तराखंड
