
कविता
एक कविता
शब्द नि हूंदी
वाक्य नि हूंदी
कुछ पंक्तियूं कू मेल नि हूंदी
कविता जुकडी़ का भितर
कू उमाल हूंद
जु उमलद् – उमलद्
जिकुडी़ का भैर ऐ जांद
शब्दों की सारू लेकी
वाक्य बण जांद
अर फिर कुछ पंक्ति
कलम की नोक पर चढी
कागज की छाती पर
अंकित ह्वै जांद,,,,
यु शब्द बिचार बणी
अपडी़ पीड़
अपडी़ चाह
अपडू़ रस्ता खोजदिंन
अंतरमन का भाव
चाहे विद्रोह का हों
या हों माया का
उजास मा उड़दू मन हो
या आंसू ळा भोरीं आंखि हो
हथूं का छाला हो
या हो खुट्टों की बिवैं
सब अपडी़ हूंदिन
जिंदगी की सार- तार मा
जु मिली सीख
सब बटोली
कविता बणि जांद,,
©®रक्षा बौडा़ई हिंलास
देहरादून
