
लौटती यादों से कह दो
लौटती यादों से कह दो,
अब रुलाना छोड़ दो।
चाहतों के इस चमन में
जी लगाना छोड़ दो।।
बंदिशों की डोर नाज़ुक,
है नहीं आती नज़र ।
है कसक मजबूर इसकी,
बस उलझना छोड़ दो।।
बंधनों से मुक्त है तो
प्रेम है आराधना ।
कैद होकर दिल लगी में,
बस तड़फना छोड़ दो।।
मुस्कुराओ मुश्किलों का
हल नहीं रोने में है ।
है इबादत इश्क प्यारे,
तुम बहकना छोड़ दो।।
ज़िंदगी इक बहता दरिया
अनवरत बहता रहे ।
संलयन होगा तमस का,
बस ठहरना छोड़ दो ।।
महकता है इश्क हर पल
रह न पाओगे जुदा ।
है मुकम्मल इस जहाँ में
कैद करना छोड़ दो ।।
रक्षा बौडा़ई “हिलांस “
देहरादून, उत्तराखंड
