
शाम ढल रही है
आ रही है शाम, श्यामल
प्रीति की चादर लिए,
लौट आए श्रांत पंछी,
नीड़ निज, नीरव हुए।
फिर जला है दीप सा मन,
अश्रुओं के तैल से,
फिर व्यथा ने मौन तोड़ा
सुप्त व्रण झंकृत किए।
इस सजग दीपक से पूछो
तू अकेला क्यों जला?
घोर रजनी में जिया तू,
कौन सा अमृत पिए।
भस्म इसकी लौ में मेरी
सब पिपाशा हो गई
मैंने इस एकल दिए संग
सौ जन्म अपने जिए।
तू जलेगा, मैं जलूंँगी,
भोर के आने तलक
तू अडिग जल, मैं भी बोलूं,
मौन अधरों पर सिए।
युग युगों से शाम यूंँ ही,
आ रही है द्वार मेरे
कब करुण क्रंदन किया?
कब याचना अपने लिए।
है प्रतीक्षा उस प्रहर की,
जिस प्रहर तू आएगा
प्राण में तुझको लपेटूँ
और भर लूंगी हिए।
राधा मैन्दोली ‘माधवी’
देहरादून, उत्तराखंड
