
क्या लिखूँ
पाप में पुण्य की हिस्सेदारी लिखूँ,
गंगा तेरे देश में प्यास की लाचारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
तन्त्र का भ्रष्ट आचरण लिखूँ,
कि सियासत की बेकारी लिखूँ।
बेईमानी के धन्धे में ही है बची,
क्या वो ईमानदारी लिख़ूँ ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
मिट गया भेद कवि और कब्बाल का,
है किसकी यह होशियारी लिखूँ।
लिखती थी दुःख दर्द जो आमजन के,
कलम वो आज हो गयी सरकारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
अनुदानों में पल रहा देश मेरा,
पी रहे घी सब सरकारी लिखूँ।
दुम सबको अपनी छोटी नजर आती,
सरकाने को फाइल बापू की इन्तजारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
चन्द हैं लोग पतलून बेदाग है जिनकी,
कैसे उनके आदर्शों की लाचारी लिखूँ।
घोड़े अस्तबल बंँधे हुए सब,
है गधों पर गधों की सवारी लिखूँँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
चश्मा लग गया आँखों में पढ़ते-पढ़ते,
होती है ऐसे कलक्टर की तैयारी लिखूँ।
कैसा है ये देखो कायदा बनाया,
पढ़े लिखों पर अनपढ़ों की सवारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
जूता बदल रहा है ईमान अपना,
बिकने को निष्ठा की बेकरारी लिखूँ,
कश्मीर से केरल तक दिखता है जो,
उसमें है सियासत की भागीदारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
खरा सोना चमक खोने लगा है।
जलती हुई डिग्रियों की लाचारी लिखूँ।
हट के होने का दावा था जिनका,
हुई उनकी भी सबसे गद्दारी लिखूँ।
कोई तो आकर समझा जाए मुझे,
कि मैं ये कहानी सारी लिखूँ।
©®नन्दन राणा “नवल”
देहरादून
