बीजे सक्या
क्वी नि ब्वलदु बीज खुणे
कि तू जमि जा।
वु अपरी सक्या ल
कबि कांडु,कबि फूल
कभी पौधा बणद।
त कभि बणद
विशाल बरगद।
वै का भितरे डी एन ए
बणांद वैथे बरगद।
बस जरा हवा, जरा पाणी
अर घामे निवति
ही त लींद वो पैंछु।
अर सौ गुणा कैरि
लौटा दींद फिर हवा
पाणी अर आग।
पूरू जीवन खपै जमि
वो अपरु लक्ष्य पै जांद।
सब्युं भितर च
वा सक्या
वैथे हि पैछणण
वी सक्या थै हैरे पैरे
पैटाण बाटु
जीवने लक्ष्य ह्वा
त वी सक्या दगड़
त पूरू करै जा सकद।
प्रेमलता सजवाण
कवयित्री, उत्तराखंड
