
ज़ख्म फिर से गहरे हो गए
अहम और वहम धरे रह गए ,
जब लौट के घाव हरे हो गए,
निराशाओं का पलड़ा भारी था,
आज ज़ख्म फिर से गहरे हो गए।
खोने को कुछ था नहीं,
मिला भी उतना कुछ नहीं ,
अब आंसुओं पर भी पहरे हो गए,
आज ज़ख्म फिर से गहरे हो गए।
मन को अपने समझाने लगी,
ढांढस खुद को बंधाने लगी,
अब दर्द ताज़ा मेरे हो गए ,
आज ज़ख्म फिर से गहरे हो गए।
क्या गिला थी उन सपनों की,
जिनको देखना भी गुनाही हुई,
अब टूट कर वो बिखरे रह गए,
आज ज़ख्म फिर से गहरे हो गए।
©®नैना कंसवाल
देहरादून
