
मैं हिमालय
मैं हिमालय इस धरा का मान हूँ अभिमान हूँ
मैं महज़ पर्वत नहीं हूँ हिंद की पहचान हूँ
जल, मृदा और जंगलों का, वायु का आगार हूँ
थामे है जो जीवन तुम्हारा मैं वो दृढ़ आधार हूँ
हाँ मगर तुमसे न पाया न्याय मैंने आज तक
इस समर्पण का नहीं प्रतिदान पाया आज तक
मैं लुटाता आ रहा हूँ तुम पे सारी संपदाएं
और पाता आ रहा बदले में केवल आपदाएं
मतलबी विकास का कैसा अजब सा दौर है
विनिमय में कुछ देते नहीं दोहन पे सारा ज़ोर है
जागो, विचारो और इस सत्य को पहचान लो
मैं मरा तो तुम नहीं फिर जी सकोगे जान लो
©®तनूजा उप्रेती
देहरादून
