
कर्म संजीवनी
बगत यु ,बगत थै दोहराणु रैंद,
फिर बिसरंयु बाटु पर लाणुं रैंद ।
बीज जु आज बुतेली सगोर से
हिस्सा मां फल बणी आणुं रैंद ।
क्वि कर्ज जरुर देण होलु तुमुन ,
वु तुम थै सुद्दि नि खिजाणुं रैंद ।
कैकी किस्मत नि लेखि सकदा हम
विधाता तुमरि गलती सुमराणु रैंद ।
ताळु मोर सोंपी छिन जैमा त्यार ,
वि अपणु त्वै फर शक खाणु रैंद ।
जिया कु उमाळ जैमा ई लगावा,
हे राम कैरि वु बस बुत्याणुं रैंद ।
माई,सांई,भाई तब तक ही छिन,
जब तक ऊंमा माया लगांणुं रैंद ।।
हजार गुण छिन तेरु भ्रम च सब ,
एक ही अवगुण कफ़न पैराणुं रैंद ।
उपदेश हिमाला मात छिन वैका,
विपदा मां चट पीठ दिखांणु रैंद ।
जिया लगै जै दगड़ जी भ्वरी की,
दगड्या हर घड़ी ज्यु झुराणुं रैद ।
कर्म संजीवनी जैनी नि चाखी,
विनी वु जिंदगी भर कणांणुं रैंद ।
©®विनीता मैठाणी
ऋषिकेश, उत्तराखंड
